प्रभु राम का चरित्र वर्तमान पीढ़ी के लिए प्रासंगिक : घिल्डियाल

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रोशनी पाण्डेय – सह सम्पादक

प्रगतिशील सांस्कृतिक पर्वतीय समिति पैठपड़ाव में रामलीला के पांचवें दिन उत्तराखंड लेखपाल संघ के पूर्व प्रदेश अध्यक्ष व टीम “नेकी की दीवार” के संचालक तारा चन्द्र घिल्डियाल ने दीप प्रज्वलित करके रामलीला का शुभारंभ किया। इस अवसर पर उन्होंने कहा की मर्यादा पुरुषोत्तम प्रभु रामचंद्र जी का चरित्र आज की पीढ़ी के लिए अत्यधिक प्रासंगिक है।वर्तमान पीढ़ी नशे की गिरफ्त में है, युवा पीढ़ी को नशे से दूर रहकर अभिनय व अन्य सांस्कृतिक क्रियाकलापों में अपनी भागीदारी सुनिश्चित करनी चाहिए।  घिल्डियाल ने बताया कि रामलीला की शुरूआत कब और कैसे हुई? दुनिया में किसने किया था सबसे पहली रामलीला का मंचन? इसका कोई प्रामाणिक दस्तावेज उपलब्ध नहीं है। रामलीला भारत में परम्परागत रूप से भगवान राम के चरित्र पर आधारित नाटक है। जिसका देश में अलग-अलग तरीकों और अलग-अलग भाषाओं में मंचन किया जाता है। भारत में भी रामलीला के ऐतिहासिक मंचन का ईसा पू्र्व का कोई प्रमाण मौजूद नहीं है। लेकिन 1500 ईं में गोस्वामी तुलसीदास (1497–1623)ने जब आम बोलचाल की भाषा ‘अवधी’ में भगवान राम के चरित्र को ‘श्री रामचरित मानस’ में चित्रित किया तो इस महाकाव्य के माध्यम से देशभर खासकर उत्तर भारत में रामलीला का मंचन किया जाने लगा। माना जाता है कि गोस्वामी तुलसीदास के शिष्यों ने शुरूआती रामलीला का मंचन (काशी, चित्रकूट और अवध) रामचरित मानस की कहानी और संवादों पर किया। इतिहासविदों के मुताबिक देश में मंचीय रामलीला की शुरुआत 16वीं सदी के आरंभ में हुई थी। इससे पहले रामबारात और रुक्मिणी विवाह के शास्त्र आधारित मंचन ही हुआ करते थे। साल 1783 में काशी नरेश उदित नारायण सिंह ने हर साल काशी के रामनगर में रामलीला कराने का संकल्प लिया। इस अवसर पर समिति के दिनेश चन्द्र सत्यवली, जगदीश चन्द्र तिवारी, चन्दन कोटवाल, रोहित गोस्वामी आदि उपस्थित रहे।

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