प्रगतिशील सांस्कृतिक पर्वतीय समिति, पैंठपड़ाव रामनगर द्वारा आयोजित रामलीला मंचन के चौथे दिन की रामलीला मंचन कार्यक्रम का शुभारम्भ “नेकी की दीवार” के संचालक तारा चन्द्र घिल्डियाल द्वारा किया गया।

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उधम सिंह राठौर _ प्रधान संपादक

*आधुनिक दौर में राम का चरित्र अत्यधिक प्रासंगिक: घिल्डिया*

*प्रेम और आदर्शों के प्रतीक श्री राम*

प्रगतिशील सांस्कृतिक पर्वतीय समिति, पैंठपड़ाव रामनगर द्वारा आयोजित रामलीला मंचन के चौथे दिन की रामलीला मंचन कार्यक्रम का शुभारम्भ “नेकी की दीवार” के संचालक तारा चन्द्र घिल्डियाल द्वारा किया गया। इस अवसर पर घिल्डियाल ने नयी पीढ़ी को राम के चरित्र को जीवन में आत्मसात करने को आवश्यक बताया। रामलीला भारत में परम्परागत रूप से भगवान राम के चरित्र पर आधारित नाटक है। जिसका देश में अलग-अलग तरीकों और अलग-अलग भाषाओं में मंचन किया जाता है। भारत में भी रामलीला के ऐतिहासिक मंचन का ईसा पू्र्व का कोई प्रमाण मौजूद नहीं है। लेकिन 1500 ईं में गोस्वामी तुलसीदास ने जब आम बोलचाल की भाषा ‘अवधी’ में भगवान राम के चरित्र को ‘श्री रामचरित मानस’ में चित्रित किया तो इस महाकाव्य के माध्यम से देशभर खासकर उत्तर भारत में रामलीला का मंचन किया जाने लगा।

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माना जाता है कि गोस्वामी तुलसीदास के शिष्यों ने शुरूआती रामलीला का मंचन (काशी, चित्रकूट और अवध) रामचरित मानस की कहानी और संवादों पर किया। इतिहासविदों के मुताबिक देश में मंचीय रामलीला की शुरुआत 16वीं सदी के आरंभ में हुई थी। इससे पहले रामबारात और रुक्मिणी विवाह के शास्त्र आधारित मंचन ही हुआ करते थे। साल 1783 में काशी नरेश उदित नारायण सिंह ने हर साल काशी के रामनगर में रामलीला कराने का संकल्प लिया।

 

 

उन्होंने बताया कि रामजी का नाम जब हम सुनते है तो हमारे मन में मर्यादा पुरुष की छवि आ जाती है ।मर्यादापुरषोतम श्री राम कलयुग में जीने का आधार है। भगवान श्री राम को याद करते है ही शांत मुख, कमल सामान नयन , मन मोहनी मुस्कान, और एक ठहर से परिपूर्ण छवि सामने आ जाती है। हम बचपन में बच्चों में कृष्ण की छवि देखते है। लेकिन जब एक पुरुष की बात आती है तो हमे सब में एक राम चाहिये। राम जो आज्ञाकारी है कैकई माँ के वनवास देने पे भी उन्होंने कभी उनका अपमान नही किया।

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राम जो पत्नी प्रिये थे सीता जी के वनवास जाने के बाद भी पर स्त्री के बारे में नही सोचा। राम जो वचन के पालन करने वाले है जब उनके पिता द्वारा वचन दिया गया तो उन्होंने वनवास जाके भी उसे पूरा किया बिना अपने कष्ट का ध्यान रखते हुए। ऐसे राम की कल्पना करते ही मन प्रसन्न हो जाता है। इस कलयुग में जीवन का आधार सिर्फ राम कथा है। उन्होंने जग को सही और गलत समझाने के लिए सारे कष्ट खुद सहे। प्रजा के राजा बनकर सीता जी को वनवास दिया लेकिन सीता जी के पति होने की वजह से खुद राजमहल में वनवास का जीवन जीते रहे।

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मेरे लिए रामजी हर मुश्किल का हल है। ये कहा भी जाता है कलयुग में तो कोई एक राम नाम भी ले ले तो उसका उद्धार निश्चित है। इस अवसर पर पूर्व राज्य मंत्री दिनेश मेहरा, अपर सहायक अभियंता उमाशंकर कुकरेती, समिति के दिनेश चन्द्र सत्यवली, गिरीश मठपाल, दीप जोशी, चन्दन कोटवाल, सोनी जोशी, मनोज तिवारी, भूपेन्द्र खाती,  वीरेन्द्र पाण्डे, नवीन करगेती, भावना भट्ट, दीप्ति रावत आदि उपस्थित रहे।


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