उत्तराखंड की सांस्कृतिक विरासत पर रामनगर में जुटे इतिहासकार, दो दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी शुरू।

उत्तराखंड की सांस्कृतिक विरासत पर रामनगर में जुटे इतिहासकार, दो दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी शुरू।

 

उधम सिंह राठौर – प्रधान संपादक

 

 

रामनगर, 10 अक्टूबर। पीएनजी राजकीय स्नातकोत्तर महाविद्यालय रामनगर में शनिवार को उत्तराखंड के सांस्कृतिक अतीत, धार्मिक वैभव और चिंतन धाराओं पर दो दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी का शुभारंभ हुआ। भारतीय इतिहास अनुसंधान परिषद (आईसीएचआर) के प्रायोजन तथा उत्तराखंड इतिहास संकलन समिति, उत्तराखंड प्रांत के तत्वावधान में आयोजित तृतीय प्रांत अधिवेशन एवं राष्ट्रीय संगोष्ठी का उद्घाटन महाविद्यालय के मयूर सभागार में किया गया। इसमें इतिहास, संस्कृति, धर्म, लोकपरंपराओं और भारतीय ज्ञान परंपरा के विभिन्न पहलुओं पर विचार-विमर्श किया गया।

 

 

कार्यक्रम के मुख्य अतिथि अखिल भारतीय इतिहास संकलन योजना, नई दिल्ली के राष्ट्रीय संगठन मंत्री डॉ. बाल मुकुंद पाण्डे रहे। विशिष्ट अतिथि डॉ. बहादुर सिंह बिष्ट और मुख्य वक्ता प्रो. शंतन सिंह नेगी ने भी विचार रखे। महाविद्यालय के प्राचार्य प्रो. एमसी पाण्डे ने अतिथियों का स्वागत किया।

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मुख्य अतिथि डॉ. बाल मुकुंद पाण्डे ने कहा कि भारतीय इतिहास सांस्कृतिक अस्मिता और राष्ट्रीय चेतना का महत्वपूर्ण आधार है। उत्तराखंड की ऐतिहासिक परंपराओं, प्राचीन ज्ञान-विरासत और सांस्कृतिक मूल्यों का अध्ययन वर्तमान और भविष्य के लिए भी प्रेरणादायी है। उन्होंने स्थानीय इतिहास, लोकस्मृतियों और ऐतिहासिक स्रोतों के संरक्षण पर जोर दिया।

 

 

 

विशिष्ट अतिथि डॉ. बहादुर सिंह बिष्ट ने हिमालय को भारतीय आध्यात्मिक चेतना का महत्वपूर्ण केंद्र बताते हुए कहा कि उत्तराखंड की लोक संस्कृति, पर्व-त्योहार, लोकदेवता, तीर्थस्थल और पारंपरिक जीवनशैली प्रदेश की विशिष्ट पहचान हैं। वहीं, मुख्य वक्ता प्रो. शंतन सिंह नेगी ने लोकपरंपराओं, मौखिक इतिहास, साहित्यिक स्रोतों और पुरातात्त्विक साक्ष्यों के समन्वित अध्ययन की आवश्यकता बताई।

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डॉ. शरद भट्ट ने लोकगीतों, लोककथाओं और पारंपरिक ज्ञान के दस्तावेजीकरण तथा सांस्कृतिक विरासत के संरक्षण पर बल दिया। प्राचार्य प्रो. एमसी पाण्डे ने कहा कि राष्ट्रीय संगोष्ठियां उच्च शिक्षा संस्थानों में शोध, अकादमिक संवाद और ज्ञान के आदान-प्रदान को बढ़ावा देती हैं। आयोजन सचिव डॉ. नरेश कुमार ने प्रमाणिक ऐतिहासिक स्रोतों और शोधपरक दृष्टिकोण की महत्ता रेखांकित की।

 

 

 

शोधपत्रों में इतिहास और संस्कृति के विविध पहलुओं पर चर्चा

संगोष्ठी के प्रथम तकनीकी सत्र में डॉ. विजय बहुगुणा ने उत्तराखंड के सांस्कृतिक अतीत, धार्मिक विशिष्टता और चिंतन धाराओं पर शोधपत्र प्रस्तुत किया। डॉ. अनिल शाह ने उत्तराखंड के स्वतंत्रता संग्राम में योगदान, डॉ. अनीता चौहान ने पर्यटन के सामाजिक जीवन पर प्रभाव तथा डॉ. अजीत कुमार रावत ने प्राचीन सभ्यता और ऐतिहासिक-सांस्कृतिक अध्ययन पर विचार रखे। डॉ. प्रशांत कुमार ने कत्यूर, चंद और पंवार राजवंशों के संदर्भ में प्राचीन मंदिरों एवं मेलों के ऐतिहासिक कालक्रम पर चर्चा की।

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द्वितीय तकनीकी सत्र में आधुनिकता का पारंपरिक संस्कृति पर प्रभाव, मध्य हिमालय में पर्यटन एवं तीर्थाटन, लोक आस्था, सामाजिक आंदोलनों और लोकसंस्कृति के संरक्षण जैसे विषय शामिल रहे। संगोष्ठी में पर्यटन, वैश्वीकरण और बदलते सामाजिक परिवेश के बीच उत्तराखंड की सांस्कृतिक पहचान बनाए रखने की चुनौतियों पर भी मंथन किया गया।

 

 

 

कार्यक्रम का संचालन डॉ. अल्का ने किया। दो दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी के अंतर्गत रविवार, 11 अक्टूबर को भी विभिन्न विषयों पर व्याख्यान और शोधपरक विचार-विमर्श जारी रहेगा।